तनुजा चंद्रा के निर्देशन में बनी करीब करीब सिंगल एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है। फिल्म में इरफान के कंधे कॉमडी का जोड़ है , तो इमोशनल फ़ैवीकोल पार्वती के हाथ में है।
कहानी मुझे थोड़ी हटकर लगी इस फिल्म में मुझे टिपिकल बॉलीवुड वाली लव स्टोरी देखने को नहीं मिली
जिसमें हीरो और हिरोइन एक-दूसरे के प्यार में डूबे हुए नजर आतें हो i love you ... जैसे जीने-मरने की कसमें खाते हों ।
फिल्म की कहानी जीना सिखाती है , यही वजह है की एक यूनिक स्टोरी है , जो हर पल मुझे हंसाती है ।
कहानी खट्टे-मीठे अनुभवों से भरी हुई है जिससे कि आप मेरी तरह खुद को कनेक्ट कर पाएंगे क्योंकि आम लव स्टोरी भी हाफुसआम जैसी नही होती ।
इसकी कहानी आज के युवाओं को शायद कुछ एक जगह ही पसन्द आएगी इरफान का बार बार ये कहना "आम को जब तक चूसा नही स्वाद नही " आम न हो मानो... खेर फ़िल्म में हर बात के दो मतलब होते है । दर्शक की नजर अभी ज़िन्दगी के मजे आम को चूसने जैसे शब्दो पर एक अजीब सी गन्द पैदा करनी वाली स्थिति पर आतंकी होती है , डेटिंग एप्स राइट लेफ्ट की स्टोरी पर जब युवा हो तो वो प्यार के कुछ एक बुनियादी एहसासों को भूलना स्वाभाविक से हो गया है । डेटिंग एप्स की कहानी का सार इस तरह भी हो सकता है ।
खेर कहानी की बात करुँ तो ये योगी यूपी वाले नही ...... (इरफान खान) और जयश्री (पार्वती) की रोड ट्रिप वाली लव स्टोरी है। दोनों की मुलाकात ऑनलाइन डेटिंग वेबसाइट के जरिए हुई है ।
इसके बाद एक-दूसरे को जानने और समझने के लिए दोनों मिलें योगी ऐसा लड़का जो चुलबुल से व्यवहार में है , चिल पिल टाइप जबकि जया ने अपनी ज़िंदगी काम में लगा रखी है दोनों की पहली मुलाकात कॉफी पर हुई जहां योगी हंसी-मजाक करने की कोशिश करते हैं जो जया को पसंद नहीं आया ,
“दो लाते (कॉफी) लाओ, लाते लाना अपनी लातें मत ले आना...”
इसके बाद दोनों ऋषिकेश, अलवर , जयपुर और गैंगटोक की यात्रा साथ में करते हैं। यात्रा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । जहॉं योगी की इस यात्रा का उदेशय अपनी इश्क की कहानी को जया से मिलवाने का होता है ।
घनघोर इश्क “टोटल तीन बार इश्क किया और तीनों बार ऐसा इश्क मतलब जानलेवा इश्क, मतलब घनघोर हद पार..... घनघोर शब्द नही हलचल है ....
वहीं जया का कोई उद्देश्य नही है यात्रा का बस कुछ नया ओर नई उम्मीद के साथ ही , आस पास से दुखी होकर साथ चलने वाली यात्रा है रही । साथ ही मन में उम्मीदों के समुद्र को समेटे । न बहने देने वाली चाहत , जैसे बह गई तो मानो व्व खुद ही डूब जायेगी । कुछ तो है जो उसे बढ़ने नही देता ।
कहानी और कहानियों से भेहद अलग है जैसे टिव्टर वाले पोस्ट कम शब्द अधिक भावना ।
तो यहां भी ऐसा है , समय कम खिंची हुई सी ,
चुलबुल रोल, इरफान का शुरू से लेकर अन्त तक आपको कुर्सी से उठकर हँसाने वाले अंदाज , या जयश्री का शांत चिड़चिड़ाहट वाला स्वभाव ,खुद से खुद की मुलाकात करवाता है ।
आप कहीं भी हो अच्छे की तलाश यात्रा से बेहतर नही हो सकती ।
फ़िल्म की खासियत ये है , की वो पासवर्ड को बदलते रहने की सलाह देती है , ओर सच है ये
एक ही चीज की अहमियत रखते रखते
हम टूट जाते है । बदलाव जरूरी है खुद के लिए।
जो सबसे अच्छा था वो था पास्ट ओर फ्यूचर का ब्लॉक होना ।
आज है ...जो है , बीता जो जमाना था.... कल जो होगा..... वो किसने देखा... जो है आज है , इस बार गाड़ी नही छूटनी चाहिये ।
जो छूट गई तो गम नही ....बीता जो जमाना होगा .... कल क्या होगा किसने देखा ।
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