2017/12/09

एक तरफा प्यार

17 मार्च 2017 का लेखन 

ट्रेन की यात्रा हमेशा नये दोस्त बनाती है,   कभी कभी कुछ अच्छे नग़्मे भी बन जाते है
 लम्बे सफर हो तो  हमेशा कहानियां बनती है,  किस्से होते है कुछ ऐसा ही है ये भी 

बहुत ही बेहतरीन फिल्माकंन है , कहने को तो ऐड है मगर यादें हैं ,  समर के सफ़रो की........   ये कहने में कोई शर्म नही मुझे #एकतरफा #प्यार जैसा कुछ होता है तो बस वो यात्रा में ही हुआ ,
 बचपन से अब तक न जाने कितने बार हुआ और आगे भी होता रहे बस यही दुआ है,  ना जाने क्यों #वो चाय वाला ,मूंगफली वाला तो कभी भेल वाला , कभी अखबार पढ़ते लोग ,तो कभी उस पर बहस करते लोग तो कभी ताश खेलते हुए कर्मचारी 
कभी वो जो पत्थर को बजा कर गाना सुनाते है तो कभी टीसी जो अपनी सीट भी बेच देता है,  महज दिवाली पर पटाखों के लिए सैलरी से घर चलता है पटाखे नही बीते जमाने की बाते । 

तो कभी वो सह यात्री जो ऊपर की सीट पर बैठ कर गाने सुनने का नाटक करता है,  मगर असल में उसे नीचे बैठे परिवार की नोंक झोंक का मजा लेते मंद मुस्कान के साथ देखा जा सकता है। 
मुझे उस से भी प्यार हुआ जो मेरा पर्स ले भागा पहले तो खूब दुःख हुआ फिर उस से भी प्यार हो गया,  ये एक तरफ का प्यार नही था
उसे मेरा गुलाबी छुटको पर्स पसन्द आया होगा , ऐसा अब लगता है उसमें समुद्र के किनारे की रेत और 500 rs डायरी थी 
 उसे पसंद आया वो ले गया मुझे पता भी नही चला , ये प्यार ही तो था ट्रेन में अक्सर प्यार होता है आप नही समझेंगे अभी पहले याद कीजिये फिर समझ आ जायेगा
शायद 
मेरे सफर कि #चार #चाँद #चन्द मुलाकाते 

मेरे नाना के साथ जो सफर रहे उन में सब से खास था , उनकी चाय 3 rs और मेरा समोसा भी 3 rs और उनका कच्चे प्याज को लोकल ट्रेन की लकड़ी वाली सीट जिसको फ़ाटकरी जैसा कुछ बोलते है , उस पर प्याज को रख कर हाथ से मारकर दो टुकड़े करना यही नही खाने में सब घर की आचार सब्जी के बाद भी प्याज न हो तो खाने का स्वाद फीका ओर लोकल में किसी को प्याज की दुर्गंध नजर नही आती सभी एक से होते है मिलबांट कर खाने वाले 

#ज़िन्दगी लोकल से थोड़ा सा ऊपर उठ कर....
 वो गदे वाली सीट पर दादाजी उनके साथ घर जाने पर ट्रेन रात के 9 बजे की हुआ करती होगी । 
घर से खाना अमूमन खा कर ही जाते है,  मगर में खाने के बाद फिर से खा लेती हूँ आज भी ........
टिफिन वो खरगोश की शक्ल वाला मेरा .....उस में माँ एक मीठा और एक नमकीन पराठा रखती थी,  जानती थी की मेरे साथ मेरे दादा भी खा लेंगे और हम रात के 12 या 1 बजे खाया करते थे । 
वो अपने साथी कर्मचारियों के साथ बातचीत करने के लिए अक्सर उनके साथ रात में चाय पीते थे मेरे दादा टी सी थे , खिड़की के बाहर पीले कलर का बल्ब जलता था और चाय पर बाते और फिर जब ट्रेन चालती तो चाँद मेरा पहला प्यार वो भी मेरे साथ होता था मैंने बहुत सी राते चाँद के साथ बिताई कभी अच्छी कभी बुरी  अब हम सभी फोन को #मूनलाइट बना अपने कमरो में  होते है मैं भी ...मैं सिर्फ यात्रा के दौरान चाँद से मिलती हूँ । अपनी घर की छत से चाँद से सिर्फ 1 मिनट की मुलाकात होती है , वो भी तब जब छत पे कोई काम हो 

" खेर में ट्रेन पे थी बस खाना खत्म और में अपनी दादी के पास ...
मेरे ददिहाल में छत बहुत अच्छी है .......नही नन्हीहाल की ये कहना मुश्किल है,  एक तरफ से ट्रेन की आवाज आती है और दूसरी तरफ से शेर की हम्म सही पढ़ रहे है , मेरा घर दोनों के बीच रहा एक तरफ से गाड़ियों का शोर भी ...............

ट्रेन के सफर से शायद भटक गई न जाने आज सब कैसे याद आये ट्रेन के सफर में गाड़ी में एक डिबा होता है , मालगाड़ी जैसा जिसमें गाड़िया लुहार थे , मैने उनके साथ भी सफर किया एक दफा तो कहते हैं ...... मैं गाड़ी के नीचे आने वाली थी बताओ ऐसे भी होता है भला जीवन जिंदगी यात्रा और अंत ............
एक यात्रा में तो राजधानी के कूपे में प्रेम हुआ , इस तरह के प्रेम प्रसंग अक्सर घातक होते है ... आप  तो  खिड़की के बाहर के चाँद को साथ में निहार रहे हो भविष्य की कल्पनाओं में इतना लीन हो की लोग आपको निहार रहे ........हो की ये कैसा प्यार है अदभुत 
अभी कुछ देर पहले ही मिले थे हम ........
अब दोनों साथ सोने की जिद कर बैठे है एक ही और से चाँद का दीदार होता है ,और उस रात मेरी और था ......
उसे मेरे साथ आना पड़ा शायद मजबूरी हो ...वैसे आइसक्रीम फ्री मिलती है खाने के साथ वो में 2 खाती हूँ एक मेरी और एक Dileepkumar पिताजी की  उस दिन भी 2 थी । 
मेरे  पास कलर्स भी थे , और डायरी भी .
और क्या चाहिये ...... एक साथ रहने के लिऐ बहुत ही जल्दी हमारी दोस्ती हुई ..... वैसे तो में ब्राह्मण हूँ अंडे खाना और देखना पाप होता था ,
वो अंडे खाकर मेरी सीट पर आया था लड़ने के लिए ये बात काफी थी मगर हम लड़े नही दोस्त बन गए  ।
नाम याद नही उसका वो 3 से 4 साल का होगा और मैं याद नही मैं  बड़ी थी उम्र नही बताती लड़कियां में भी ऐसा कर रहीे हूँ , प्यार  की कोई उम्र नही होती वो अहमदाबाद की ट्रेन थी ..  हम पूरी रात सोये नही drwaing की चाँद की बाते और फिर सो गए ।
सुबह उसकी माँ ले गई उसे ...........
माँ बताती है कि मुझे उठाया गया था  मगर मैं  उठी नही वो लोग उतर गए। वो बहुत क्यूट था ,  और मैं तो हूँ ही अब भी ट्रेन की बहुत सीे यादें हैं  ।किताब लिख सकती हूँ ,  शायद आपको  भी पसन्द आ्येगी ।

हम सब को डायरी लिखनी चाहिए ,  मेरे बचपन में समोसा 3 का था और क्रीम रोल 4 का आज 20 और 15 के हो गये हैं ......  #यादें  #जिंदगी #सफर #ट्रेन ये वीडियो अब तक का सबसे 

https://fb-l-a-a.akamaihd.net/h-ak-fbx/v/t42.1790-2/17345152_1859490110931825_1972179429622808576_n.mp4?efg=eyJ2ZW5jb2RlX3RhZyI6InN2ZV9zZCJ9&oh=af23700d913a996aca541b57c9b29640&oe=5A2B0E91&__gda__=1512771633_a86006ad3169f29e31a5b01dfdfe40ed

उम्दा  वीडियो है ....शायद जिनका आईडिया है , वो ट्रेन के  सफर से प्यार करते  हो मेरी तरह ...

2017/11/11

करीब करीब सिंगल

तनुजा चंद्रा के निर्देशन में बनी करीब करीब सिंगल एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है। फिल्म में इरफान के कंधे कॉमडी का जोड़ है , तो इमोशनल फ़ैवीकोल पार्वती के हाथ में है।

कहानी मुझे थोड़ी हटकर लगी इस फिल्म में मुझे टिपिकल बॉलीवुड वाली लव स्टोरी देखने को नहीं मिली 
जिसमें हीरो और हिरोइन एक-दूसरे के प्यार में डूबे हुए नजर आतें हो i love you ... जैसे जीने-मरने की कसमें खाते हों । 

फिल्म की कहानी जीना सिखाती है , यही वजह है  की एक यूनिक स्टोरी है , जो हर पल मुझे  हंसाती है ।

कहानी खट्टे-मीठे अनुभवों से भरी हुई है जिससे कि आप मेरी तरह  खुद को कनेक्ट कर पाएंगे क्योंकि आम लव स्टोरी भी हाफुसआम जैसी नही होती । 

इसकी कहानी आज के युवाओं को शायद कुछ एक जगह ही पसन्द आएगी इरफान का बार बार ये कहना "आम को जब तक चूसा नही स्वाद नही " आम न हो मानो... खेर फ़िल्म में हर बात के दो मतलब होते है । दर्शक की नजर अभी ज़िन्दगी के मजे आम को चूसने जैसे शब्दो पर एक अजीब सी गन्द पैदा करनी वाली स्थिति पर आतंकी होती है , डेटिंग एप्स राइट लेफ्ट की स्टोरी पर जब युवा हो तो वो प्यार के कुछ एक बुनियादी एहसासों को भूलना स्वाभाविक से हो गया है । डेटिंग एप्स की कहानी का सार इस तरह भी हो सकता है  ।

खेर कहानी की बात करुँ तो ये योगी यूपी वाले नही ...... (इरफान खान) और जयश्री (पार्वती) की रोड ट्रिप वाली लव स्टोरी है। दोनों की मुलाकात ऑनलाइन डेटिंग वेबसाइट के जरिए हुई है ।

इसके बाद एक-दूसरे को जानने और समझने के लिए दोनों मिलें योगी ऐसा लड़का जो चुलबुल से व्यवहार में है , चिल पिल टाइप  जबकि जया ने अपनी ज़िंदगी काम में लगा रखी है  दोनों की पहली मुलाकात कॉफी पर हुई जहां योगी हंसी-मजाक करने की कोशिश करते हैं जो जया को पसंद नहीं आया ,

“दो लाते (कॉफी) लाओ, लाते लाना अपनी लातें मत ले आना...”

इसके बाद दोनों ऋषिकेश, अलवर , जयपुर और गैंगटोक की यात्रा साथ में करते हैं। यात्रा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । जहॉं योगी की इस यात्रा का उदेशय अपनी इश्क की कहानी को जया से मिलवाने का होता है ।

घनघोर इश्क  “टोटल तीन बार इश्क किया और तीनों बार ऐसा इश्क मतलब जानलेवा इश्क, मतलब घनघोर हद पार..... घनघोर शब्द नही हलचल है ....

वहीं जया का कोई उद्देश्य नही है यात्रा का बस कुछ नया ओर नई उम्मीद के साथ ही , आस पास से दुखी होकर साथ चलने वाली यात्रा है रही । साथ ही मन में उम्मीदों के समुद्र को समेटे । न बहने देने वाली चाहत , जैसे बह गई तो मानो व्व खुद ही डूब जायेगी । कुछ तो है जो उसे बढ़ने नही देता ।

कहानी और कहानियों से भेहद अलग है जैसे टिव्टर वाले पोस्ट कम शब्द अधिक भावना ।
तो यहां भी ऐसा है , समय कम खिंची हुई सी ,
चुलबुल रोल, इरफान का शुरू से लेकर अन्त तक आपको कुर्सी से उठकर हँसाने वाले अंदाज , या जयश्री का शांत चिड़चिड़ाहट वाला स्वभाव ,खुद से खुद की मुलाकात करवाता है ।

आप कहीं भी हो अच्छे की तलाश यात्रा से बेहतर नही हो सकती ।
फ़िल्म की खासियत ये है , की वो पासवर्ड को बदलते रहने की सलाह देती है , ओर सच है ये
एक ही चीज की अहमियत रखते रखते
हम टूट जाते है । बदलाव जरूरी है खुद के लिए।

जो सबसे अच्छा था वो था पास्ट ओर फ्यूचर का ब्लॉक होना ।
आज है ...जो है , बीता जो जमाना था.... कल जो होगा..... वो किसने देखा... जो है आज है , इस बार गाड़ी नही छूटनी चाहिये ।
जो छूट गई तो गम नही ....बीता जो जमाना होगा .... कल क्या होगा किसने देखा ।

2017/11/05

तहजीब को नोशफरमाइये

जब भी आप खुश नही हो
वो करो जो आपको ठीक लग रहा है ।
उन लोगो से मिलो जिन से आपने काफी समय से बात नही की है ।
कुछ उनकी सुनो , कुछ अपनी कहो ।
ऐसे वक्त में किताबे ओर सोशल मीडिया ओर परिवार से जितना दूर रहा जाये ये अच्छा है ।
जितने आज के युग में सोशल मीडिया का प्रवाह है , उतना ही परिवारवाद ओर समाजवाद का ये ना जीने देंगे , न मरने देंगे ।

ये  हमे हमारे असली नेचर से नकली बनाने में लगे होते है । असल जिंदगी की किताब हम खुद लिखते है , हमारे अच्छे बुरे किस्से , यादें या फिर भावनाएं ये इसका हिस्सा होती है , ओर किताब का हिस्सा सभी लोग होते आये है , दो लोगो का प्यार हो या दुश्मनी सब को पीसना है ।

इन सब पर वो ज्ञान पेला जा रहा होता है जिसका आप ओर हम  अपनी ज़िंदगी के किस्सो से तालुक  करने लगते है । 

नया कुछ भी नही , किताब पर ही गोर करो ऐसी कौनसी किताब रही जिस , के सभी पात्र एक दूसरे को समझ पाए हो , कोई भी नही है और अगर है तो मैनें नही पढ़ी ,तो ये मेरी गलती है ,मगर जो मैने समझा बात कुछ में उस तरह करूँगी
मान लो कि किताब के हर पात्र से आपको प्यार है तो क्या सभी से एक जैसा है । तो फिर किताब खास कैसे हुई कुछ तो ओर भी है ,जो उसे अलग करता है , फिर वो चाहे सभी पात्रों का हमे पसंद होना ही हो ।

जैसे किताब है काल्पनिक वैसे ही ज़िंन्दगी जब तक जी नही लेते नही लिख सकते । काल्पनिक भी लिखो तब भी कल्पना के संग घोड़े पे दौड़ लगा रहे हो ।
सो कुल मिला के बात ये है ।, ज्ञान लो खुद से 100 को कहो 200 कि राय फ्री आयेगी । ओर
ओर जो खुद से खुद को ज्ञान देने काल्पनिक

चित्रण भी ,तुमने रच लिया ना , तो तुम्हे सच में आत्म सन्तुष्टि मिलेगी ।
खुद से खुद की मुलाकात का सिलसिला तुम्हे नई दिशा देगा । और कल तुम शायद अपनी किताब लिख दो
ओर समझदार लोग न पढ़े , या पढ़ कर अपनी एक किताब लिख दें ।

मान के चलो एक नई दुनिया होगी ।
राम रहीम के फर्जी किस्से नही होंगे ।
बस होंगे तो अच्छे बुरे अनुभव

कितना ज्ञान पेल दिया मैंने भी ।

खेर तुम फिकर न करो दोस्त और अपने दिमाग के घोड़े न दौड़ाओ , दिल से सोचो , ज़िस्म ओर ज़िन्दगी दोनो दिल से जीते जाते है,
दिमाग से सिर्फ तलवार चलती है , ओर कहते है चाकू की नोंक पर ज़िस्म नोंचे जाते है । जीते नही जाते । फतह दिल से हो तो ठीक न हो तो रास्ते सब को एक मोड़ पे ला खड़ा करते हैं और मोड़ के बाद फिर से नए रास्ते बनते है 

तहजीब , अदब  को नोश फरमाइये मगर उतना जितना अपच न करे । नही तो क्या खा तो लेंगे प्यार से । मगर सुबह जो अपच होगी न दोस्त उसका तुम्हे पता है , सब की ज़िन्दगी में अपच शब्द ने घर बनाया है , किसी के यहां 2 दिन किसी के यहां 4 । अब ये ऐसा है अपच न हो तो भी कुछ होता है , मरोड़े ये
(शब्द लिखते वक्त ही बहुत मुस्कुरा रही हूँ , तो आप पढ़ते वक्त जोर जोर से खिलखिला उठे ऐसी मेरी सोच है लिखते वक्त )
बड़े बूढो से सुना होगा ।

तो क्या है अति किसी भी चीज की बुरी है
अब अति शब्द के भी सभी के जीवन के अपने मायने है ।
जितनी समझ उतने मायने न कम न ज्यादा समझ का स्तर पढंने से नही या किसी भी बात को सिर हिला कर हांजी नाजी कहने से नही

समान सम्मान की , ओर अधिकारों की लड़ाई है ज़िन्दगी । मेरी भी तुम्हारी भी ।
तो अदब तहजीब का पान मसाला नोश फरमाइए गुलकंद के साथ कत्था स्वाद अनुसार ,गुलकंद कुछ ज्यादा ।