2017/11/05

तहजीब को नोशफरमाइये

जब भी आप खुश नही हो
वो करो जो आपको ठीक लग रहा है ।
उन लोगो से मिलो जिन से आपने काफी समय से बात नही की है ।
कुछ उनकी सुनो , कुछ अपनी कहो ।
ऐसे वक्त में किताबे ओर सोशल मीडिया ओर परिवार से जितना दूर रहा जाये ये अच्छा है ।
जितने आज के युग में सोशल मीडिया का प्रवाह है , उतना ही परिवारवाद ओर समाजवाद का ये ना जीने देंगे , न मरने देंगे ।

ये  हमे हमारे असली नेचर से नकली बनाने में लगे होते है । असल जिंदगी की किताब हम खुद लिखते है , हमारे अच्छे बुरे किस्से , यादें या फिर भावनाएं ये इसका हिस्सा होती है , ओर किताब का हिस्सा सभी लोग होते आये है , दो लोगो का प्यार हो या दुश्मनी सब को पीसना है ।

इन सब पर वो ज्ञान पेला जा रहा होता है जिसका आप ओर हम  अपनी ज़िंदगी के किस्सो से तालुक  करने लगते है । 

नया कुछ भी नही , किताब पर ही गोर करो ऐसी कौनसी किताब रही जिस , के सभी पात्र एक दूसरे को समझ पाए हो , कोई भी नही है और अगर है तो मैनें नही पढ़ी ,तो ये मेरी गलती है ,मगर जो मैने समझा बात कुछ में उस तरह करूँगी
मान लो कि किताब के हर पात्र से आपको प्यार है तो क्या सभी से एक जैसा है । तो फिर किताब खास कैसे हुई कुछ तो ओर भी है ,जो उसे अलग करता है , फिर वो चाहे सभी पात्रों का हमे पसंद होना ही हो ।

जैसे किताब है काल्पनिक वैसे ही ज़िंन्दगी जब तक जी नही लेते नही लिख सकते । काल्पनिक भी लिखो तब भी कल्पना के संग घोड़े पे दौड़ लगा रहे हो ।
सो कुल मिला के बात ये है ।, ज्ञान लो खुद से 100 को कहो 200 कि राय फ्री आयेगी । ओर
ओर जो खुद से खुद को ज्ञान देने काल्पनिक

चित्रण भी ,तुमने रच लिया ना , तो तुम्हे सच में आत्म सन्तुष्टि मिलेगी ।
खुद से खुद की मुलाकात का सिलसिला तुम्हे नई दिशा देगा । और कल तुम शायद अपनी किताब लिख दो
ओर समझदार लोग न पढ़े , या पढ़ कर अपनी एक किताब लिख दें ।

मान के चलो एक नई दुनिया होगी ।
राम रहीम के फर्जी किस्से नही होंगे ।
बस होंगे तो अच्छे बुरे अनुभव

कितना ज्ञान पेल दिया मैंने भी ।

खेर तुम फिकर न करो दोस्त और अपने दिमाग के घोड़े न दौड़ाओ , दिल से सोचो , ज़िस्म ओर ज़िन्दगी दोनो दिल से जीते जाते है,
दिमाग से सिर्फ तलवार चलती है , ओर कहते है चाकू की नोंक पर ज़िस्म नोंचे जाते है । जीते नही जाते । फतह दिल से हो तो ठीक न हो तो रास्ते सब को एक मोड़ पे ला खड़ा करते हैं और मोड़ के बाद फिर से नए रास्ते बनते है 

तहजीब , अदब  को नोश फरमाइये मगर उतना जितना अपच न करे । नही तो क्या खा तो लेंगे प्यार से । मगर सुबह जो अपच होगी न दोस्त उसका तुम्हे पता है , सब की ज़िन्दगी में अपच शब्द ने घर बनाया है , किसी के यहां 2 दिन किसी के यहां 4 । अब ये ऐसा है अपच न हो तो भी कुछ होता है , मरोड़े ये
(शब्द लिखते वक्त ही बहुत मुस्कुरा रही हूँ , तो आप पढ़ते वक्त जोर जोर से खिलखिला उठे ऐसी मेरी सोच है लिखते वक्त )
बड़े बूढो से सुना होगा ।

तो क्या है अति किसी भी चीज की बुरी है
अब अति शब्द के भी सभी के जीवन के अपने मायने है ।
जितनी समझ उतने मायने न कम न ज्यादा समझ का स्तर पढंने से नही या किसी भी बात को सिर हिला कर हांजी नाजी कहने से नही

समान सम्मान की , ओर अधिकारों की लड़ाई है ज़िन्दगी । मेरी भी तुम्हारी भी ।
तो अदब तहजीब का पान मसाला नोश फरमाइए गुलकंद के साथ कत्था स्वाद अनुसार ,गुलकंद कुछ ज्यादा ।

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