2017/11/11

करीब करीब सिंगल

तनुजा चंद्रा के निर्देशन में बनी करीब करीब सिंगल एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है। फिल्म में इरफान के कंधे कॉमडी का जोड़ है , तो इमोशनल फ़ैवीकोल पार्वती के हाथ में है।

कहानी मुझे थोड़ी हटकर लगी इस फिल्म में मुझे टिपिकल बॉलीवुड वाली लव स्टोरी देखने को नहीं मिली 
जिसमें हीरो और हिरोइन एक-दूसरे के प्यार में डूबे हुए नजर आतें हो i love you ... जैसे जीने-मरने की कसमें खाते हों । 

फिल्म की कहानी जीना सिखाती है , यही वजह है  की एक यूनिक स्टोरी है , जो हर पल मुझे  हंसाती है ।

कहानी खट्टे-मीठे अनुभवों से भरी हुई है जिससे कि आप मेरी तरह  खुद को कनेक्ट कर पाएंगे क्योंकि आम लव स्टोरी भी हाफुसआम जैसी नही होती । 

इसकी कहानी आज के युवाओं को शायद कुछ एक जगह ही पसन्द आएगी इरफान का बार बार ये कहना "आम को जब तक चूसा नही स्वाद नही " आम न हो मानो... खेर फ़िल्म में हर बात के दो मतलब होते है । दर्शक की नजर अभी ज़िन्दगी के मजे आम को चूसने जैसे शब्दो पर एक अजीब सी गन्द पैदा करनी वाली स्थिति पर आतंकी होती है , डेटिंग एप्स राइट लेफ्ट की स्टोरी पर जब युवा हो तो वो प्यार के कुछ एक बुनियादी एहसासों को भूलना स्वाभाविक से हो गया है । डेटिंग एप्स की कहानी का सार इस तरह भी हो सकता है  ।

खेर कहानी की बात करुँ तो ये योगी यूपी वाले नही ...... (इरफान खान) और जयश्री (पार्वती) की रोड ट्रिप वाली लव स्टोरी है। दोनों की मुलाकात ऑनलाइन डेटिंग वेबसाइट के जरिए हुई है ।

इसके बाद एक-दूसरे को जानने और समझने के लिए दोनों मिलें योगी ऐसा लड़का जो चुलबुल से व्यवहार में है , चिल पिल टाइप  जबकि जया ने अपनी ज़िंदगी काम में लगा रखी है  दोनों की पहली मुलाकात कॉफी पर हुई जहां योगी हंसी-मजाक करने की कोशिश करते हैं जो जया को पसंद नहीं आया ,

“दो लाते (कॉफी) लाओ, लाते लाना अपनी लातें मत ले आना...”

इसके बाद दोनों ऋषिकेश, अलवर , जयपुर और गैंगटोक की यात्रा साथ में करते हैं। यात्रा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है । जहॉं योगी की इस यात्रा का उदेशय अपनी इश्क की कहानी को जया से मिलवाने का होता है ।

घनघोर इश्क  “टोटल तीन बार इश्क किया और तीनों बार ऐसा इश्क मतलब जानलेवा इश्क, मतलब घनघोर हद पार..... घनघोर शब्द नही हलचल है ....

वहीं जया का कोई उद्देश्य नही है यात्रा का बस कुछ नया ओर नई उम्मीद के साथ ही , आस पास से दुखी होकर साथ चलने वाली यात्रा है रही । साथ ही मन में उम्मीदों के समुद्र को समेटे । न बहने देने वाली चाहत , जैसे बह गई तो मानो व्व खुद ही डूब जायेगी । कुछ तो है जो उसे बढ़ने नही देता ।

कहानी और कहानियों से भेहद अलग है जैसे टिव्टर वाले पोस्ट कम शब्द अधिक भावना ।
तो यहां भी ऐसा है , समय कम खिंची हुई सी ,
चुलबुल रोल, इरफान का शुरू से लेकर अन्त तक आपको कुर्सी से उठकर हँसाने वाले अंदाज , या जयश्री का शांत चिड़चिड़ाहट वाला स्वभाव ,खुद से खुद की मुलाकात करवाता है ।

आप कहीं भी हो अच्छे की तलाश यात्रा से बेहतर नही हो सकती ।
फ़िल्म की खासियत ये है , की वो पासवर्ड को बदलते रहने की सलाह देती है , ओर सच है ये
एक ही चीज की अहमियत रखते रखते
हम टूट जाते है । बदलाव जरूरी है खुद के लिए।

जो सबसे अच्छा था वो था पास्ट ओर फ्यूचर का ब्लॉक होना ।
आज है ...जो है , बीता जो जमाना था.... कल जो होगा..... वो किसने देखा... जो है आज है , इस बार गाड़ी नही छूटनी चाहिये ।
जो छूट गई तो गम नही ....बीता जो जमाना होगा .... कल क्या होगा किसने देखा ।

2017/11/05

तहजीब को नोशफरमाइये

जब भी आप खुश नही हो
वो करो जो आपको ठीक लग रहा है ।
उन लोगो से मिलो जिन से आपने काफी समय से बात नही की है ।
कुछ उनकी सुनो , कुछ अपनी कहो ।
ऐसे वक्त में किताबे ओर सोशल मीडिया ओर परिवार से जितना दूर रहा जाये ये अच्छा है ।
जितने आज के युग में सोशल मीडिया का प्रवाह है , उतना ही परिवारवाद ओर समाजवाद का ये ना जीने देंगे , न मरने देंगे ।

ये  हमे हमारे असली नेचर से नकली बनाने में लगे होते है । असल जिंदगी की किताब हम खुद लिखते है , हमारे अच्छे बुरे किस्से , यादें या फिर भावनाएं ये इसका हिस्सा होती है , ओर किताब का हिस्सा सभी लोग होते आये है , दो लोगो का प्यार हो या दुश्मनी सब को पीसना है ।

इन सब पर वो ज्ञान पेला जा रहा होता है जिसका आप ओर हम  अपनी ज़िंदगी के किस्सो से तालुक  करने लगते है । 

नया कुछ भी नही , किताब पर ही गोर करो ऐसी कौनसी किताब रही जिस , के सभी पात्र एक दूसरे को समझ पाए हो , कोई भी नही है और अगर है तो मैनें नही पढ़ी ,तो ये मेरी गलती है ,मगर जो मैने समझा बात कुछ में उस तरह करूँगी
मान लो कि किताब के हर पात्र से आपको प्यार है तो क्या सभी से एक जैसा है । तो फिर किताब खास कैसे हुई कुछ तो ओर भी है ,जो उसे अलग करता है , फिर वो चाहे सभी पात्रों का हमे पसंद होना ही हो ।

जैसे किताब है काल्पनिक वैसे ही ज़िंन्दगी जब तक जी नही लेते नही लिख सकते । काल्पनिक भी लिखो तब भी कल्पना के संग घोड़े पे दौड़ लगा रहे हो ।
सो कुल मिला के बात ये है ।, ज्ञान लो खुद से 100 को कहो 200 कि राय फ्री आयेगी । ओर
ओर जो खुद से खुद को ज्ञान देने काल्पनिक

चित्रण भी ,तुमने रच लिया ना , तो तुम्हे सच में आत्म सन्तुष्टि मिलेगी ।
खुद से खुद की मुलाकात का सिलसिला तुम्हे नई दिशा देगा । और कल तुम शायद अपनी किताब लिख दो
ओर समझदार लोग न पढ़े , या पढ़ कर अपनी एक किताब लिख दें ।

मान के चलो एक नई दुनिया होगी ।
राम रहीम के फर्जी किस्से नही होंगे ।
बस होंगे तो अच्छे बुरे अनुभव

कितना ज्ञान पेल दिया मैंने भी ।

खेर तुम फिकर न करो दोस्त और अपने दिमाग के घोड़े न दौड़ाओ , दिल से सोचो , ज़िस्म ओर ज़िन्दगी दोनो दिल से जीते जाते है,
दिमाग से सिर्फ तलवार चलती है , ओर कहते है चाकू की नोंक पर ज़िस्म नोंचे जाते है । जीते नही जाते । फतह दिल से हो तो ठीक न हो तो रास्ते सब को एक मोड़ पे ला खड़ा करते हैं और मोड़ के बाद फिर से नए रास्ते बनते है 

तहजीब , अदब  को नोश फरमाइये मगर उतना जितना अपच न करे । नही तो क्या खा तो लेंगे प्यार से । मगर सुबह जो अपच होगी न दोस्त उसका तुम्हे पता है , सब की ज़िन्दगी में अपच शब्द ने घर बनाया है , किसी के यहां 2 दिन किसी के यहां 4 । अब ये ऐसा है अपच न हो तो भी कुछ होता है , मरोड़े ये
(शब्द लिखते वक्त ही बहुत मुस्कुरा रही हूँ , तो आप पढ़ते वक्त जोर जोर से खिलखिला उठे ऐसी मेरी सोच है लिखते वक्त )
बड़े बूढो से सुना होगा ।

तो क्या है अति किसी भी चीज की बुरी है
अब अति शब्द के भी सभी के जीवन के अपने मायने है ।
जितनी समझ उतने मायने न कम न ज्यादा समझ का स्तर पढंने से नही या किसी भी बात को सिर हिला कर हांजी नाजी कहने से नही

समान सम्मान की , ओर अधिकारों की लड़ाई है ज़िन्दगी । मेरी भी तुम्हारी भी ।
तो अदब तहजीब का पान मसाला नोश फरमाइए गुलकंद के साथ कत्था स्वाद अनुसार ,गुलकंद कुछ ज्यादा ।